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*पाप और पूण्य क्या है..??*


     *पाप और पूण्य क्या है..??*
            *मुझे नही पता*
    *मुझे तो बस ये ही पता है...,*
     *जिस कार्य से किसी का*
          *दिल दुःखे वो पाप..,*
                   *और...*
   *किसी के चेहरे पे हँसी आये..*
               *वो पूण्य..*
       
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 *पूण्य क्या है..??*

१. प्रस्तावना

दैनिक जीवन में कर्म करते समय, हम उन कर्मों का फल पुण्य एवं पाप के रूप में भोगते हैं । पुण्य एवं पाप हमें अनुभव होनेवाले सुख और दुख की मात्रा निर्धारित करते हैं । अतएव यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि पापकर्म से कैसे बचें । वैसे तो अधिकांश लोग सुखी जीवन की आकांक्षा रखते हैं; परन्तु जिन लोगों को आध्यात्मिक प्रगति की इच्छा है, वे यह जानने की जिज्ञासा रखते हैं कि क्यों मोक्षप्राप्ति के आध्यात्मिक पथ में पुण्य भी अनावश्यक हैं ।

२. पुण्य एवं पाप क्या है ?

पुण्य अच्छे कर्मों का फल है, जिनके कारण हम सुख अनुभव करते हैं । पुण्य वह विशेष ऊर्जा अथवा विकसित क्षमता है, जो भक्तिभाव से धार्मिक जीवनशैली का अनुसरण करने से प्राप्त होती है । उदाहरणार्थ मित्रों की आर्थिक सहायता करना अथवा परामर्श देना पुण्य को आमन्त्रित करना है । धार्मिकता तथा धर्माचरण की विवेचना अनेक धर्मग्रंथों में विस्तृतरूप से की गई है । पुण्य के माध्यम से हम दूसरों का कल्याण करते हैं । उदाहरण के लिए कैन्सर पीडितों की सहायता के लिए दान करने से कैन्सर से जूझ रहे अनेक रोगियों को लाभ होगा, जिससे हमें पुण्य मिलेगा ।
पाप क्या है, पाप बुरे कर्म का फल है, जिससे हमें दुख मिलता है । किसी और का बुरा चाहने की इच्छा से कर्म करने पर पाप उत्पन्न होता है । यह उन कर्मों से उत्पन्न होता है जो प्रकृति अथवा ईश्वर के नियमों के विपरीत अथवा उसके विरुद्ध हों । उदाहरण के लिए यदि कोई व्यापारी अपने ग्राहकों को ठगता है, तो उसे पाप लगता है । कर्त्तव्य-पूर्ति नहीं करने पर भी पाप उत्पन्न होता है, उदा. जब कोई पिता अपने बच्चों की आवश्यकताओं की ओर ध्यान नहीं देता अथवा जब वैद्य अपने रोगियों का ध्यान नहीं रखता ।
पुण्य और पाप इसी जन्म में, मृत्यु के उपरांत अथवा आगामी जन्मों में भोगने पडते हैं ।
पुण्य एवं पाप क्या है, पुण्य और पाप लेन-देन के हिसाब से सूक्ष्म होते हैं; क्योंकि लेन-देन का हिसाब समझना तुलनात्मक रूप से सरल है उदा. परिवार के स्तर पर, परन्तु यह समझना बहुत कठिन है कि क्यों किसीने एक अपरिचित का अनादर किया ।

३. पुण्य और पाप के कारण

पुण्यसंचय के अनेक कारण हो सकते हैं । प्रमुख कारण हैं :
  • परोपकार
  • धर्मग्रंथों में बताए अनुसार धर्माचरण
  • दूसरे की साधना के लिए त्याग करना । उदाहरण के लिए यदि कोई बहू अपने कार्य से छुट्टी लेकर घर संभालती है, जिससे उसकी सास तीर्थयात्रा पर जा सके, तो बहू को सासद्वारा अर्जित तीर्थयात्रा के फल का आधा भाग मिलेगा । तथापि जहांतक संभव हो, दूसरों पर निर्भर होकर साधना न करें ।
पाप संचय के कुछ कारण हैं :
  • क्रोध, लालच एवं ईर्ष्या के रूप में स्वार्थ एवं वासना व्यक्ति को पाप के लिए उद्युक्त करते हैं ।
  • सिद्धांतहीन अथवा क्रूर होना
  • किसी भिखारी से अपमानजनक बात करना
  • मांस एवं मदिरा का सेवन करना
  • प्रतिबन्धित वस्तुएं बेचना, ऋण न चुकाना, काले धनका व्यवहार, जुआ
  • झूठी गवाही देना, झूठे आरोप लगाना
  • चोरी करना
  • दुराचार, व्यभिचार, बलात्कार इत्यादि
  • हिंसा
  • पशुहत्या
  • आत्महत्या
  • ईश्वर, मंदिर, आध्यात्मिक संस्था इत्यादि की संपत्तिका अनावश्यक व्यय एवं दुरुपयोग इत्यादि
  • अधिवक्ताओं को पाप लगता है, क्योंकि वे सत्य को असत्य एवं असत्य को सत्य बनाते हैं ।
  • पति को पत्नी के पापकर्म का आधा फल भोगना पडता है; क्योंकि उसने अपनी पत्नी को पापकर्म करने से न रोकने के कारण वह पाप का भागीदार बनता है ।
  • पतिद्वारा अधर्म से अर्जित संपत्ति व्यय करनेवाली तथा ज्ञात होने पर भी उसे न रोकनेवाली पत्नी को पाप लगता है ।
  • पापी के साथ एक वर्ष रहनेवाला भी उसके पाप का भागी हो जाता है ।

४. पुण्य एवं पाप का प्रभाव

४.१ सुख के रूप में पुण्य का प्रभाव

पुण्य एवं पाप क्या है, पुण्य की मात्रा के अनुपात में व्यक्ति को पृथ्वी पर उतना सुख मिलता है और अंत में पृथ्वी पर अपने जीवनकाल में अपेक्षासहित कर्म से अर्जित पुण्य से वे स्वर्ग में सुख पाते हैं :
  • सुसंस्कृत एवं धनाढ्य परिवार में जन्म
  • बढती आय
  • सांसारिक सुख
  • इच्छापूर्ति
  • स्वस्थ जीवन
  • समाज, संस्था एवं शासनद्वारा प्रशंसा एवं सम्मान
  • आध्यात्मिक प्रगति
  • मृत्यु के उपरांत स्वर्ग सुख
मनुष्य जन्म, अच्छे कुल-परिवार में जन्म, धन, दीर्घायु, स्वस्थ शरीर, अच्छे मित्र, अच्छा पुत्र, प्रेम करनेवाला जीवनसाथी, भगवद्-भक्ति, बुद्धिमत्ता, नम्रता, इच्छाओं पर नियंत्रण एवं पात्र व्यक्ति को दान देने की ओर झुकाव, ऐसे पहलू हैं, जो पूर्वजन्म के पुण्यकर्मों के बिना असंभव है । जब यह सब हो, तो जो पुण्यात्मा इसका लाभ उठाता है और साधना करता है, उसकी आध्यात्मिक प्रगति होती है ।
जब समष्टि पुण्य बढता है, तो राष्ट्र सिद्धांत (दर्शन) और आचरण में सर्वश्रेष्ठ होता है तथा समृद्ध होता है ।

४.२ दुख के रूप में पाप का प्रभाव

कृपया पढें हमारा लेख पाप का फल

५. पुण्य एवं पापार्जन कैसे होता है ?

पुण्य एवं पाप का सिद्धांत समझने के लिए किसी भी कर्म का उद्देश्य जानना महत्त्वपूर्ण है । निम्नलिखित सारणी से यह स्पष्ट होगा, जहां हमने धनार्जन के कर्म की मनोवृत्ति तथा उसे खर्च करने का उद्देश्य विभिन्न उदाहरणों से समझाया है । इससे उत्पन्न पुण्य एवं पाप की मात्रा प्रत्येक उदाहरण के सामने दी है ।


६. पुण्य की सीमाएं

आध्यात्मिक प्रगतिके परिप्रेक्ष्य में, पुण्य की अपनी सीमा है ।

६.१ पुण्य का फल भोगना पडता है

पुण्य एवं पाप क्या है, पुण्यवान जीवन, मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति को स्वर्गलोक ले जाता है, परन्तु एकबार पुण्य समाप्त हो जाए, तो व्यक्ति को पृथ्वी पर पुनः अगला जन्म लेना पडता है । इस कारण पुण्य भी एक प्रकार का बन्धन है । केवल साधना ही हमें मोक्षतक ले जाती है ।

६.२ सुख भोगने से अंततः पुण्य समाप्त हो जाते हैं

पुण्य एवं पाप क्या है, प्रत्येक क्षण सुख भोगने पर, हमारा पुण्य समाप्त हो जाता है, इसलिए व्यक्ति को पुण्य बढाने के लिए परिश्रम करना पडता है । इसके लिए पुण्यप्रद कर्म अथवा साधना करनी पडती है । अन्तर केवल इतना है कि पुण्यप्रद कर्मों से सुख मिलता है, जबकि साधना से आध्यात्मिक प्रगति होती है अर्थात इससे नंद मिलता है, जो पुण्य-पाप तथा सुख-दुख से परे होता है, इसका उपफल सुख है ।

७. संक्षेप में – पुण्य एवं पाप क्या है!

पुण्य एवं पाप में अन्तर के साथ ही उनकी गहराई और उनके प्रभाव की महत्ता समझने से हम अपने आचरण और कर्मों को नियन्त्रित कर सकते हैं । तथापि दोनों से मुक्त होने हेतु नियमित साधना करना आवश्यक है ।




 *पाप क्या है..??*

१. परिचय- पाप क्या है ?

प्रतिदिन के कर्म करते समय हमसे कई प्रकार के पाप कर्म होते हैं । उदा. झाडू लगाते समय कीडे-मकौडों की हत्या, दूसरों से कठोर बोलना इत्यादि । पाप के विषय को अच्छे से समझने के लिए हम कुछ प्रकार के पाप और उसके परिणाम किसे भुगतने पडते हैं यह देखेंगे ।

२. पाप के प्रकार

२.१ पाप से कौन प्रभावित होता है, इस आधार पर उसका वर्गीकरण

इस आधार पर कि पाप से कौन प्रभावित होते हैं, ऐसे पाप होते हैं जो अपना और दूसरों का अहित करते हैं, जैसा कि निम्न सारणी में दिखाया है ।
केवल अपना ही अहित करना
कौन प्रभावित होता है, इस आधार पर पाप के प्रकार
केवल अपना ही अहित करना
साधना हेतु नित्य प्रयास न करना
केवल अपना ही अहित करना
अपनी कर्मेंद्रियों एवं ज्ञानेंद्रियों पर नियंत्रण न रखना, अर्थात विभिन्न
इच्छाएं, वासनाएं, क्रोध तथा लोभ पर नियंत्रण न रखना ।
दूसरे का अहित करना
अज्ञानवश अहित होना, उदा. पथपर चलते समय अथवा पानी
उबालते समय अनायास जंतु अथवा जीवाणु मरते हैं ।
दूसरे का अहित करना
स्वेच्छा से दूसरों का अनिष्ट करना

२.२ काया, वाचा एवं मन के अनुसार पाप के प्रकार

व्यक्ति पहले मन में पापकर्म का निश्चय करता है, तत्पश्चात उस पाप का उच्चारण करता है अथवा देह से उसका आचरण करता है । इस प्रकार से मनुष्य तीन प्रकार से पापकर्म करता है, जैसा कि निम्न सारणी में दिखाया है ।
काया, वाचा एवं मन के अनुसार पाप के प्रकार
कायिक पाप
शरीर से किया गया पाप, उदा. चोरी करना, किसी की हत्या करना, व्यभिचार ।
वाचिक पाप
बोलने के कारण किया गया पाप, उदा. अपशब्द बोलना, निंदा करना, असत्य बोलना, असंबद्ध बोलना ।
मानसिक पाप
मन से किए पाप, उदा. दूसरों के धन की अभिलाषा, दूसरों का अनिष्ट सोचना (यहां पर हमारे विचारों से निर्माण होने वाले नकारात्मक स्पंदनों के कारण जो दूसरों को कष्ट होता है, उसके कारण पाप लगता है । यह कुदृष्टि (नजर) लगने की प्रक्रिया समान है ।)
कुदृष्टि से संबंधित अधिक जानकारी के लिए कृपया कुदृष्टि (नजर) यह लेख पढें ।

३. क्या हम केवल विचारों से पाप कर सकते हैं ?

कर्मयोग के अनुसार, पुण्यमय कर्म का केवल विचार मन में आने से भी पुण्य लगता है, परंतु केवल पापमय विचार से पाप नहीं लगता । उदा. किसी बैंक को लूटने का केवल विचार करने से पाप नहीं लगता, जबकि प्रत्यक्ष में बैंक को लूटने से पाप लगेगा । यहां पर मानसिक पाप के पहले उदाहरण समान, केवल विचार करने से पाप नहीं लगता क्योंकि उससे किसी को हानि नहीं पहुंचती ।
जबकि साधक के मन में आए अनिष्ट विचारों से उसे पाप लगता है । इसमें, क्योंकि साधक का ध्येय स्वयं में ईश्वरीय गुणों का विकास करना होता है तथा ईश्वर उसके लिए साधक को आवश्यक ज्ञान और शक्ति प्रदान करते हैं, अनिष्ट विचारों से ईश्वर की शक्ति का अपव्यय होता है । इसके लिए एक अपवाद है, अनिष्ट शक्तियों के तीव्र कष्ट से पीडित साधकों का अपने विचारों पर नियंत्रण नहीं रहता ।

४. किसे पाप का परिणाम भोगना पडता है ?

४.१ पाप में भागीदार

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तथा कायिक-वाचिक-मानसिक कैसे भी हो, पाप का समर्थन अथवा उसे बढावा देने वाले व्यक्ति को उसके अनुरूप पाप का परिणाम भोगना पडता है । वह पाप के भागीदार बन जाते हैं । वर्तमान समय में कानून में भी ऐसी व्यवस्था की गई है । हत्या करने वाले के साथ-साथ, हत्या में सहयोग करने वाला भी दोषी होता है ।
पापी मनुष्य के साथ संभाषण, उसका स्पर्श, सान्निध्य, उसके साथ भोजन, उसके साथ एकासन, शयन तथा उसके साथ यात्रा करने से एक व्यक्ति का पाप दूसरे व्यक्ति में संक्रमित होता है ।
जैसे कि सत्संग परम सत्य की संगति है, कुसंग असत्य की संगति है । कुसंग में रहने से बुरे संस्कार हममें निर्माण होते हैं अथवा बढते हैं तथा उससे हमारी आध्यात्मिक अधोगति होती है । इसलिए जो हमें प्रिय होते हैं उन्हें हम बुरी संगति से दूर रहने के लिए कहते हैं ।

४.२ पापसंक्रमण

पवित्र ग्रंथ मत्स्यपुराण में कहा गया है कि पाप सांसर्गिक अथवा अनुवांशिक रोग के समान फैलता है । कोई पाप तुरंत फलित होता ही है ऐसा नहीं है, पापी पर धीरे-धीरे पाप का परिणाम होता है और उसका समूल नाश करता है । यदि व्यक्ति स्वयं अपने पापों को नहीं भोगता तो उसके पुत्र एवं पौत्रों को भोगना पडता है । इस प्रकार पाप तीन पीढियों तक अपना परिणाम दिखाता है । अत: परिवार के अन्य सदस्य तथा अपनी संतति के प्रति हम उत्तरदायी होते हैं ।
पाप के और भी कई उदाहरण हैं जहां पापों की भागीदारी होती है, उदा. पति-पत्नी, कंपनी संचालक तथा वहां के कर्मचारी इत्यादि ।

४.३ समष्टि पाप

प्रारब्ध पर विजय पाने की तथा अपने साथ ही संपूर्ण सृष्टि को सुखी करने की क्षमता ईश्वर ने केवल मुनष्य को ही दी है । ऐसा होते हुए भी, वह अपनी क्षमता का उपयोग स्वार्थ साधने, निष्पाप जीवों पर अत्याचार करने, अन्यों पर अधिकार जमाने इत्यादि के लिए करने लगता है तब अधर्माचरण के कारण समाज समष्टि प्रारब्ध से दूषित होता है ।
इसका प्रभाव संपूर्ण सृष्टि पर होकर संपूर्ण सृष्टि का संतुलन बिगडता है । परिणामस्वरूप, मनुष्य पर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकंप, युद्ध जैसी आपदाएं आती हैं । यद्यपि यह आपदाएं दृश्य स्वरूप में होती हैं, तथापि उनके मूलभूत कारण अदृश्य स्वरूप के होते हैं । जब पृथ्वी पर इस प्रकार के समष्टि प्रारब्ध का प्रकोप होता है, तब दुर्जनों के साथ सज्जनों को भी इसके परिणाम भोगने पडते हैं ।

६. सारांश में – पाप के प्रकार

पाप का फल हमारे साथ अन्यों को भी हानि पहुंचाता है, इसलिए यह आवश्यक है कि हम पाप करने से बचें । दूसरों के स्वभाव और कृति को समझना भी बहुत आवश्यक है क्योंकि दूसरों के पाप देखकर आंख मूंद लेने से हम भी उनके पाप में भागीदार बनते हैं ।
एक कहावत है कि बुरा समय बहुत कुछ सिखा जाता है । हमें यह दृष्टिकोण रखना चाहिए कि हमारा प्रारब्ध हमारे पापों का ही परिणाम है । प्रारब्ध को भोगना साधना ही है ऐसा दृष्टिकोण रखने से हमारी तीव्र आध्यात्मिक प्रगति हो सकती है ।
साधना से हम प्रारब्ध पर विजय प्राप्त कर सकते हैं अथवा उसे सहन करने की शक्ति हमें मिलती है ।